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October 07, 2022

ACK-H-847-Jagjeewan Ram

जगजीवन राम

सामाजिक न्याय के योद्धा 




बिहार के भोजपुर जिला के चंदवा गांव में 5 अप्रैल 1908 को जन्मे जगजीवन राम आधुनिक भारतीय राजनीति के शिखर पुरुष जिन्हें आदर से 'बाबूजी' के नाम से संबोधित किया जाता था, की भारतीय इतिहास और राजनीति में महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है। लगभग 50 वर्षो के संसदीय जीवन में राष्ट्र के प्रति उनका समर्पण और निष्ठा बेमिसाल रही है। उनका संपूर्ण जीवन राजनीतिक, सामाजिक सक्रियता और विशिष्ट उपलब्धियों से भरा हुआ है। सदियों से शोषण और उत्पीड़ित दलितों, मज़दूरों के मूलभूत अधिकारों की रक्षा के लिए जगजीवन राम द्वारा किए गए क़ानूनी प्रावधान ऐतिहासिक हैं। जगजीवन राम का ऐसा व्यक्तित्व था जिसने कभी भी अन्याय से समझौता नहीं किया और दलितों के सम्मान के लिए हमेशा संघर्षरत रहे। विद्यार्थी जीवन से ही उन्होंने अन्याय के प्रति आवाज़ उठाते रहे हैं | वह स्वतंत्र भारत के उन गिने चुने नेताओं में थे जिन्होंने देश की राजनीति के साथ ही दलित समाज को भी नयी दिशा प्रदान की।



  • Title : Jagjeewan Ram
  • Volume/Serial No.(new) : 847
  • Volume/Serial No. (old) : ...
  • Pages : 44
  • Language : Hindi
  • Published in year :2021


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    Category : Bravehearts

    August 26, 2022

    Gaurav Gatha(Hindi)-01-Veer Sawarkar

     गौरव गाथा (हिंदी) संख्या-01-वीर सावरकर















    सावरकर दुनिया के अकेले स्वातंत्र्य योद्धा थे जिन्हें दो-दो आजीवन कारावास की सजा मिली, सजा को पूरा किया और फिर से राष्ट्र जीवन में सक्रिय हो गए। वे विश्व के ऐसे पहले लेखक थे जिनकी कृति 1857 का प्रथम स्वतंत्रता को दो-दो देशों ने प्रकाशन से पहले ही प्रतिबंधित कर दिया। सावरकर पहले ऐसे भारतीय राजनीतिज्ञ थे जिन्होंने सर्वप्रथम विदेशी वस्त्रों की होली जलाई। वे पहले स्नातक थे जिनकी स्नातक की उपाधि को स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लेने के कारण अँगरेज सरकार ने वापस ले लिया। वीर सावरकर पहले ऐसे भारतीय राजनीतिज्ञ थे जिन्होंने सर्वप्रथम विदेशी वस्त्रों की होली जलाई। वीर सावरकर पहले ऐसे भारतीय विद्यार्थी थे जिन्होंने इंग्लैंड के राजा के प्रति वफादारी की शपथ लेने से मना कर दिया। फलस्वरूप उन्हें वकालत करने से रोक दिया गया। वीर सावरकर ने राष्ट्र ध्वज तिरंगे के बीच में धर्म चक्र लगाने का सुझाव सर्वप्रथम ‍दिया था, जिसे राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने माना। उन्होंने ही सबसे पहले पूर्ण स्वतंत्रता को भारत के स्वतंत्रता आंदोलन का लक्ष्य घोषित किया। वे ऐसे प्रथम राजनैतिक बंदी थे जिन्हें विदेशी (फ्रांस) भूमि पर बंदी बनाने के कारण हेग के अंतरराष्ट्रीय न्यायालय में मामला पहुँचा। वे पहले क्रांतिकारी थे जिन्होंने राष्ट्र के सर्वांगीण विकास का चिंतन किया तथा बंदी जीवन समाप्त होते ही जिन्होंने अस्पृश्यता आदि कुरीतियों के विरुद्ध आंदोलन शुरू किया। दुनिया के वे ऐसे पहले कवि थे जिन्होंने अंदमान के एकांत कारावास में जेल की दीवारों पर कील और कोयले से कविताएँ लिखीं और फिर उन्हें याद किया। इस प्रकार याद की हुई दस हजार पंक्तियों को उन्होंने जेल से छूटने के बाद पुन: लिखा।

    • गौरव गाथा
    • शीर्षक          : वीर सावरकर
    • अंक              : 01
    • कुल पृष्ठ        : 36
    • भाषा            : हिंदी
    • प्रकाशक      : गौरव गाथा पब्लिकेशन, नई दिल्ली 
    • प्रकाशन वर्ष :  मई 1980
    पढ़ें :  50 mb

    August 26, 2022

    Gaurav Gatha (Hindi)-02-Bhagat Singh

     गौरव गाथा (हिंदी) संख्या-02-भगत सिंह















    अमर शहीद सरदार भगत सिंह का नाम कौन नहीं जानता, जब भी अमर शहीद सरदार भगत सिंह का नाम लिया जाता है तो दिल में इनके लिए अपार श्रद्धा उमड़ जाती है और सिर सम्मान में झुक जाता है | भगत सिंह जी का जन्म 1907 में लायपुर (अब पाकिस्तान में) जिले के एक गांव सरदार किशनसिंह जी के घर में हुआ | इनका परिवार शूरवीरता के लिए माना जाता था, कभी कभी इनके पुरे परिवार को ही जेल में बंद कर दिया जाता था | भगत सिंह जी बचपन से ही मेधावी थे इन्होंने उच्च शिक्षा प्राप्त की | 
    भगत सिंह जी महात्मा गांधी जी से प्रेरित होकर उनके असहयोग आंदोलन में कूद गये, बाद मैं वे क्रांतिकारियों से मिल गये और देश को आजाद कराने में जुट गये| 30 अक्टूबर 1928 को साइमन कमीशन के विरोध में लाहौर में लोग नारे लगा रहे थे तो अंग्रेजो ने लोगों पर डण्डे चलाये जिसमें लाला लाजपतराय जी की मौत हो गयी, इनकी मौत का बदला लेने के लिए भगत सिंह और उनके दोस्तों ने स्कॉट सांडर्स को गोलियों से भून दिया | उसके बाद भगत सिंह रूप बदल कर कंही और चले गये, फिर भगत सिंह ने लोकसभा में बम फेंका, पर बम ऐसी जगह फेंका कि किसी को चोट न लगे, फिर इन्होने असेंबली में पर्चे फेंके और इंकलाब जिंदाबाद के नारे लगाये| इनको पकड़ लिया गया और 1931 को भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव तीनो को फांसी दे दी गयी I इससे सारा देश भड़क उठा और जनता ने अंग्रेजो के विरुद्ध विद्रोह कर दिया | इनकी शहादत रंग लायी और 15 अगस्त 1947 को देश आजाद हो गया और उस स्थान पर भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव तीनो की समाधियां बना दी गई | आज भी लोग वंहा पर अपने श्रद्धा सुमन अर्पित करते हैं|


    • गौरव गाथा
    • शीर्षक         : भगत सिंह
    • अंक             : 02
    • कुल पृष्ठ        : 36
    • भाषा            : हिंदी
    • प्रकाशक      : गौरव गाथा पब्लिकेशन, नई दिल्ली 
    • प्रकाशन वर्ष : जून 1980
    पढ़ें : 55 mb

    August 26, 2022

    Gaurav Gatha(Hindi)-03-Netaji Subhashchandra Bose

    गौरव गाथा(हिंदी) संख्या-03-नेताजी सुभाषचन्द्र बोस
















    नेताजी सुभाषचन्द्र बोस का नाम भारत का बच्चा-बच्चा जानता है| नेताजी स्व्तन्त्रता संग्राम के अमर सेनानियों में से एक है | नेताजी का जन्म 23 January 1897 को कटक में श्री जानकी दास जी के घर में हुआ | नेताजी बचपन से ही मेधावी छात्र थे | माता प्रभावती और स्वामी विवेकानन्द जी का प्रभाव इन पर बहुत पड़ा, कॉलेज में अंग्रेज प्रोफेसरों के गलत व्यवहार को ये सहन नहीं कर सके और एक अंग्रेज को पीट डाला और नेताजी को 2 साल के लिए कॉलेज से निकल दिया फिर भी 1919 मैं बी ए की परीक्षा प्रथम श्रेणी में पास की फिर नेताजी महात्मा गांधी के आंदोलन में शामिल हो गये और इन्हें 6 महीने का कारावास हुआ | 1938 में नेताजी हरिपुरा राष्ट्रीय महासभा (कांग्रेस) के प्रधान चुने गये| 29 जनवरी 1941 को नेताजी चुपके से देश से बाहर चले गये और हिटलर और मुसोलिनी जैसे नेताओं से मिले| फिर नेताजी ने बैंकाक में आजाद हिन्द फ़ौज की स्थापना की और वंहा रहने वाले हिन्दुस्तानियों ने उनकी तन-मन-धन से सहायता की| आजाद हिन्द सेना देश को आजाद करने के लिए भारत की ओर चल पड़ी, अंग्रेज भी आजाद हिन्द सेना से हार मानने लगे|
    नेताजी कहते थे “तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा” जापान के हिरोशिमा और नागासाकी पर परमाणु बम गिराने के साथ ही सारा संसार कांप उठा, आजाद हिन्द फ़ौज को जापान से मिलने वाली सहायता नहीं मिल सकी| जिसके कारण नेताजी की योजना अधूरी रह गयी और आजाद हिन्द फ़ौज के काफी सैनिक बन्दी बना लिए गये |नेताजी जिस विमान में गये थे, उसका आज तक पता नहीं लगा I ऐसा कहते हैं कि विमान दुर्घटना में नेताजी की मृत्यु हो गयी| जो भी हो आज भी हम भारतवासियों के मन में नेताजी हमेशा जिन्दा रहेंगे और मन में सदा उनके लिए सम्मान रहेगा|

    • गौरव गाथा
    • शीर्षक          : नेताजी सुभाषचन्द्र बोस
    • अंक              : 03
    • कुल पृष्ठ        : 36
    • भाषा            : हिंदी
    • प्रकाशक      : गौरव गाथा पब्लिकेशन, नई दिल्ली 
    • प्रकाशन वर्ष : अक्टूबर 1980
    पढ़ें : 47 mb

    August 26, 2022

    Gaurav Gatha(Hindi)-04-Shri Ram Krishna Paramhansa

    गौरव गाथा (हिंदी) संख्या-04-श्री रामकृष्ण परमहंस


















    रामकृष्ण परमहंस भारत के एक महान संत एवं विचारक थे। इन्होंने सभी धर्मों की एकता पर जोर दिया। उन्हें बचपन से ही विश्वास था कि ईश्वर के दर्शन हो सकते हैं अतः ईश्वर की प्राप्ति के लिए उन्होंने कठोर साधना और भक्ति का जीवन बिताया। स्वामी रामकृष्ण मानवता के पुजारी थे। साधना के फलस्वरूप वह इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि संसार के सभी धर्म सच्चे हैं और उनमें कोई भिन्नता नहीं। वे ईश्वर तक पहुँचने के भिन्न-भिन्न साधन मात्र हैं। मानवीय मूल्यों के पोषक संत रामकृष्ण परमहंस का जन्म १८ फ़रवरी १८३६ को बंगाल प्रांत स्थित कामारपुकुर ग्राम में हुआ था। इनके बचपन का नाम गदाधर था। रामकृष्ण के माता पिता को उनके जन्म से पहले ही अलौकिक घटनाओ और दृश्यों का अनुभव हुआ था । सात वर्ष की अल्पायु में ही गदाधर के सिर से पिता का साया उठ गया। ऐसी विपरीत परिस्थिति में पूरे परिवार का भरण-पोषण कठिन होता चला गया। आर्थिक कठिनाइयां आईं बालक गदाधर का साहस कम नहीं हुआ । इनके बडे भाई रामकुमार चट्टोपाध्याय कोलकाता में एक पाठशाला के संचालक थे। वे गदाधर को अपने साथ कोलकाता ले गए। रामकृष्ण का अन्तर्मन अत्यंत निश्छल, सहज और विनयशील था। संकीर्णताओं से वह बहुत दूर थे। अपने कार्यो में लगे रहते थे।सतत प्रयासों के बाद भी रामकृष्ण का मन अध्ययन-अध्यापन में नहीं लग पाया। १८५५ में रामकृष्ण परमहंस के बड़े भाई रामकुमार चट्टोपाध्याय को दक्षिणेश्वर काली मंदिर के मुख्य पुजारी के रूप में नियुक्त किया गया था। रामकृष्ण और उनके भांजे ह्रदय रामकुमार की सहायता करते थे । रामकृष्ण को देवी प्रतिमा को सजाने का दाईत्व दिया गया था। १८५६ में रामकुमार के मृत्यु के पश्चात रामकृष्ण को काली मंदिर में पुरोहित के तौर पर नियुक्त किया गया। वे काली माता के मूर्ति को अपनी माता और ब्रम्हांड की माता के रूप में देखने लगे। 
    कहा जाता हैं की श्री रामकृष्ण को काली माता के दर्शन ब्रम्हांड की माता के रूप में हुआ था। कलकत्ता के बुद्धिजीवियों पर उनके विचारो ने ज़बरदस्त प्रभाव छोड़ा था ; हलाकि उनकी शिक्षाये आधुनिकता और राष्ट्र के आज़ादी के बारे में नहीं थी । उनके आध्यात्मिक आंदोलन ने परोक्ष रूप से देश में राष्ट्रवाद की भावना बढ़ने का काम किया क्यूंकि उनकी शिक्षा जातिवाद एवं धार्मिक पक्षपात को नकारती हैं ।
    रामकृष्ण के अनुसार ही मनुष्य जीवन का सबसे बड़ा लक्ष्य हैं। रामकृष्ण कहते थे की कामिनी -कंचन ईश्वर प्राप्ति के सबसे बड़े बाधक हैं।
    रामकृष्ण संसार को माया के रूप में देखते थे। उनके अनुसार अविद्या माया सृजन के काले शक्तियों को दर्शाती हैं (यह मानव को चेतना के निचले स्तर पर रखती हैं। यह शक्तिया मनुष्य को जन्म और मृत्यु के चक्र में बंधने के लिए ज़िम्मेदार हैं। वही विद्या माया सृजन की अच्छी शक्तियों के लिए ज़िम्मेदार हैं |




    •  गौरव गाथा
    •  शीर्षक          : श्री रामकृष्ण परमहंस
    • अंक              : 04
    • कुल पृष्ठ        : 36
    • भाषा            : हिंदी
    • प्रकाशक      : गौरव गाथा पब्लिकेशन, नई दिल्ली 
    • प्रकाशन वर्ष : जनवरी 1981
    पढ़ें : 67 mb

    August 26, 2022

    Gaurav Gatha(Hindi)-05-Surya Sen

     गौरव गाथा (हिंदी) संख्या-05-सूर्य सेन















    सूर्य सेन भारत की स्वतंत्रता संग्राम के महान क्रान्तिकारी थे। सूर्य सेन के पिता का नाम  था। चटगांव के नोआपारा इलाके के निवासी रमानिरंजन के पुत्र सूर्य सेन एक अध्यापक थे, वे नेशनल हाईस्कूल में सीनियर ग्रेजुएट शिक्षक के रूप में कार्यरत थे और लोग प्यार से उन्हें "मास्टर दा" कहकर सम्बोधित करते थे।  १९१६ में उनके एक अध्यापक ने उनको क्रांतिकारी विचारों से प्रभावित किया जब वह इंटरमीडियेट की पढ़ाई कर रहे थे और वह अनुशिलन समूह से जुड़ गये। बाद में वह बहरामपुर कालेज में बी ए की पढ़ाई करने गये और जुगन्तर से परिचित हुए और जुगंतकर के विचारों से काफी प्रभावित रहे। उन्होने इंडियन रिपब्लिकन आर्मी की स्थापना की और चटगांव विद्रोह का सफल नेतृत्व किया। घटना 18 अप्रैल 1930 से शुरू होती है जब बंगाल के चटगांव में आजादी के दीवानों ने अंग्रेजों को उखाड़ फेंकने के लिए सूर्यसेन के नेतृत्व में दर्जनों क्रांतिकारियों ने चटगांव के शस्त्रागार को लूटकर अंग्रेज शासन के खात्मे की घोषणा कर दी। क्रांति की ज्वाला के चलते हुकूमत के नुमाइंदे भाग गए और चटगांव में कुछ दिन के लिए अंग्रेजी शासन का अंत हो गया।इस घटना ने आग में घी का काम किया और बंगाल से बाहर देश के अन्य हिस्सों में भी स्वतंत्रता संग्राम उग्र हो उठा। इस घटना का असर कई महीनों तक रहा। पंजाब में हरिकिशन ने वहां के गवर्नर की हत्या की कोशिश की। दिसंबर 1930 में विनय बोस, बादल गुप्ता और दिनेश गुप्ता ने कलकत्ता की राइटर्स बिल्डिंग में प्रवेश किया और स्वाधीनता सेनानियों पर जुल्म ढ़हाने वाले पुलिस अधीक्षक को मौत के घाट उतार दिया। आईआरए की इस जंग में दो लड़कियों प्रीतिलता वाडेदार और कल्पना दत्त ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। सत्ता डगमगाते देख अंग्रेज बर्बरता पर उतर आए। महिलाओं और बच्चों तक को नहीं बख्शा गया। आईआरए के अधिकतर योद्धा गिरफ्तार कर लिए गए और तारकेश्वर दत्तीदार को फांसी पर लटका दिया गया।
    अंग्रेजों से घिरने पर प्रीतिलता ने जहर खाकर मातृभमि के लिए जान दे दी, जबकि कल्पना दत्त को आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई। सूर्यसेन को फरवरी 1933 में गिरफ्तार कर लिया गया और 12 जनवरी 1934 को अंग्रेजों ने उन्हें फांसी दे दी।


    • गौरव गाथा
    • शीर्षक         : सूर्य सेन
    • अंक             : 05
    • कुल पृष्ठ       : 36
    • भाषा            : हिंदी
    • प्रकाशक      : गौरव गाथा पब्लिकेशन, नई दिल्ली 
    • प्रकाशन वर्ष : फरवरी 1981
    पढ़ें : 57 mb

    August 26, 2022

    Gaurav Gatha(Hindi)-06-Jawahar Lal Nehru

     गौरव गाथा (हिंदी) संख्या-06-जवाहरलाल नेहरू













    स्वतंत्र भारत के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू का जन्म 14 नवंबर, 1889 को इलाहाबाद में हुआ। उन्होंने छह बार कांग्रेस अध्यक्ष के पद को सुशोभित किया। हैरो और कैम्ब्रिज में पढ़ाई कर 1912 में नेहरूजी ने बार-एट-लॉ की उपाधि ग्रहण की और वे बार में बुलाए गए। 1942 के 'भारत छोड़ो' आंदोलन में नेहरूजी 9 अगस्त, 42 को बंबई में गिरफ्तार हुए और अहमदनगर जेल में रहे, आजादी के पहले गठित अंतरिम सरकार में और आजादी के बाद 1947 में भारत के प्रधानमंत्री बने और 27 मई, 1964 को उनके निधन तक इस पद पर बने रहे। नेहरू के कार्यकाल में लोकतांत्रिक परंपराओं को मजबूत करना, राष्ट्र और संविधान के धर्मनिरपेक्ष चरित्र को स्थायी भाव प्रदान करना और योजनाओं के माध्यम से देश की अर्थव्यवस्था को सुचारु करना उनके मुख्य उद्देश्य रहे।
    • गौरव गाथा
    • शीर्षक          : जवाहरलाल नेहरू
    • अंक              : 06
    • कुल पृष्ठ        : 36
    • भाषा            : हिंदी
    • प्रकाशक      : गौरव गाथा पब्लिकेशन, नई दिल्ली 
    • प्रकाशन वर्ष : मार्च 1981
    पढ़ें : 77 mb

    August 26, 2022

    Gaurav Gatha(Hindi)-07-Mather Teressa

     गौरव गाथा (हिंदी) संख्या-07-मदर टेरेसा















    मदर टेरेसा का जन्म 26 अगस्त 1910 को अग्नेसे गोंकशे बोजशियु के नाम से एक अल्बेनीयाई परिवार में उस्कुब, ओटोमन साम्राज्य (आज का सोप्जे, मेसेडोनिया गणराज्य) में हुआ था। मदर टेरसा रोमन कैथोलिक नन थीं, जिनके पास भारतीय नागरिकता थी। उन्होंने 1950 में कोलकाता में मिशनरीज़ ऑफ चेरिटी की स्थापना की। 45 सालों तक गरीब, बीमार, अनाथ और मरते हुए इन्होंने लोगों की मदद की और साथ ही चेरिटी के मिशनरीज के प्रसार का भी मार्ग प्रशस्त किया।
    1970 तक वे ग़रीबों और असहायों के लिए अपने मानवीय कार्यों के लिए प्रसिद्द हो गयीं, माल्कोम मुगेरिज के कई वृत्तचित्र और पुस्तक जैसे समथिंग ब्यूटीफुल फॉर गोड में इसका उल्लेख किया गया। उन्होंने 1979 में नोबेल शांति पुरस्कार और 1980 में भारत का सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न प्रदान किया गया। मदर टेरेसा के जीवनकाल में मिशनरीज़ ऑफ चेरिटी का कार्य लगातार विस्तृत होता रहा और उनकी मृत्यु के समय तक यह 123 देशों में 610 मिशन नियंत्रित कर रही थी। इसमें एचआईवी/एड्स, कुष्ठ और तपेदिक के रोगियों के लिए धर्मशालाएं/ घर शामिल थे और साथ ही सूप रसोई, बच्चों और परिवार के लिए परामर्श कार्यक्रम, अनाथालय और विद्यालय भी थे। मदर टेरसा की मृत्यु के बाद उन्हें पोप जॉन पॉल द्वितीय ने धन्य घोषित किया और उन्हें कोलकाता की धन्य की उपाधि प्रदान की। हार्ट अटैक के कारण 5 सितंबर 1997 के दिन मदर टैरेसा की मृत्यु हुई ।



    • गौरव गाथा
    • शीर्षक          : मदर टेरेसा
    • अंक              : 07
    • कुल पृष्ठ        : 36
    • भाषा            : हिंदी
    • प्रकाशक      : गौरव गाथा पब्लिकेशन, नई दिल्ली 
    • प्रकाशन वर्ष : अप्रैल 1981
    पढ़ें : 63 mb

    August 26, 2022

    Gaurav Gatha(Hindi)-08-Lala Lajapat Rai

     गौरव गाथा (हिंदी) संख्या-08-लाला लाजपत राय
















    लाला लाजपत राय (जन्म 28 जनवरी 1865) भारत के एक प्रमुख स्वतंत्रता सेनानी थे। इन्हें पंजाब केसरी भी कहा जाता है। इन्होंने पंजाब नैशनल बैंक और लक्ष्मी बीमा कम्पनी की स्थापना भी की थी। ये भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में गरम दल के तीन प्रमुख नेताओं  बाल गंगाधर तिलक और बिपिन चंद्र पाल के साथ इस त्रिमूर्ति को लाल-बाल-पाल के नाम से जाना जाता था। इन्हीं तीनों नेताओं ने सबसे पहले भारत में पूर्ण स्वतन्त्रता की माँग की थी बाद में समूचा देश इनके साथ हो गया। इन्होंने स्वामी दयानन्द सरस्वती के साथ मिलकर आर्य समाज को पंजाब में लोकप्रिय बनाया। लाला हंसराज के साथ दयानन्द एंग्लो वैदिक विद्यालयों का प्रसार किया भाग जिन्हें आजकल डीएवी स्कूल्स व कालेज के नाम से जाना जाता है। लालाजी ने अनेक स्थानों पर अकाल में शिविर लगाकर लोगों की सेवा भी की थी। 30 अक्टूबर 1928 को इन्होंने लाहौर में साइमन कमीशन के विरुद्ध आयोजित एक विशाल प्रदर्शन में हिस्सा लिया, जिसके दौरान हुए लाठी-चार्ज में ये बुरी तरह से घायल हो गये। उस समय इन्होंने कहा था: "मेरे शरीर पर पड़ी एक-एक लाठी ब्रिटिश सरकार के ताबूत में एक-एक कील का काम करेगी।" और वही हुआ भी; लालाजी के बलिदान के 20 साल के भीतर ही ब्रिटिश साम्राज्य का सूर्य अस्त हो गया। 17 नवंबर 1928 को इन्हीं चोटों की वजह से इनका देहान्त हो गया। 



    • गौरव गाथा 
    • शीर्षक         : लाला लाजपत राय
    • अंक             : 08
    • कुल पृष्ठ        : 36
    • भाषा            : हिंदी
    • प्रकाशक      : गौरव गाथा पब्लिकेशन, नई दिल्ली 
    • प्रकाशन वर्ष : जून 1981

    पढ़ें :  55 mb

    August 26, 2022

    Gaurav Gatha(Hindi)-09-Munshi Premchand

     गौरव गाथा (हिंदी) संख्या-09-मुंशी प्रेमचंद















    मुंशी प्रेमचंद हमारे देश के साहित्य-सम्राट थे | वे उर्दू तथा हिंदी दोनों भाषाओँ में चोटी के कथाकार-उपन्यासकार माने जाते हैं |उन्होंने लगभग एक दर्ज़न उपन्यास 300 कहानियां कुछ निबंध, नाटक और जीवनियाँ लिखी |
    प्रेमचंद ने गरीबी का अनुभव  किया था और अपने ही अनुभवों को साहित्य में चरितार्थ किया | उन्होंने निर्भीकता से असहाय किसानो, बेसहारा मज़दूरों, निर्बल औरतों तथा दलित वर्ग के साथ किये जा रहे अन्याय के विरुद्ध सर्वप्रथम आवाज़ उठाई 
    उनकी भाषा में ग्रामीण जीवन की सरलता झलकती है | उनके चरित्र चित्रण में ऐसी यथार्थता है की पाठक उसके साथ एकाकार हो जाते हैं |उस समय भारत में स्वतंत्रता-संग्राम जोरों पर था प्रेमचंद ने अपने देशवासियों में देशभक्ति की ज्योति जलाई तथा उनके हृदयों में राजनैतिक और सामाजिक जागरण पैदा किया |
    प्रेमचंद की रचनाएं तो दुनिया की सर्वश्रेष्ठ कृतियों में गिनी जाती है |   
    • गौरव गाथा
    • शीर्षक          : मुंशी प्रेमचंद
    • अंक              : 09
    • कुल पृष्ठ        : 36
    • भाषा             : हिंदी 
    • प्रकाशक       : गौरव गाथा प्रकाशन
    • प्रकाशन वर्ष  : अगस्त 1981
    पढ़ें : 51 mb

    August 25, 2022

    Gaurav Gatha(Hindi)-10-Ras Bihari Bose

     गौरव गाथा (हिंदी)-10-रास बिहारी बोस














    रासबिहारी बोस भारत के एक क्रान्तिकारी नेता थे जिन्होने ब्रिटिश राज के विरुद्ध गदर षडयंत्र एवं आजाद हिन्द फौज के संगठन का कार्य किया। इन्होंने न केवल भारत में कई क्रान्तिकारी गतिविधियों का संचालन करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी, अपितु विदेश में रहकर भी वह भारत को स्वतन्त्रता दिलाने के प्रयास में आजीवन लगे रहे। दिल्ली में तत्कालीन वायसराय लार्ड चार्ल्स हार्डिंग पर बम फेंकने की योजना बनाने, गदर की साजिश रचने और बाद में जापान जाकर इंडियन इंडिपेंडेस लीग और आजाद हिंद फौज की स्थापना करने में रासबिहारी बोस की महत्वपूर्ण भूमिका रही। यद्यपि देश को स्वतन्त्र कराने के लिये किये गये उनके ये प्रयास सफल नहीं हो पाये, तथापि स्वतन्त्रता संग्राम में उनकी भूमिका का महत्व बहुत ऊँचा है। भारत को ब्रिटिश शासन की गुलामी से मुक्ति दिलाने की जी-तोड़ मेहनत करते हुए किन्तु इसकी आस लिये हुए 21 जनवरी 1945 को इनका निधन हो गया। उनके निधन से कुछ समय पहले जापानी सरकार ने उन्हें आर्डर आफ द राइजिंग सन के सम्मान से अलंकृत भी किया था।

    • गौरव गाथा
    • शीर्षक          : रास बिहारी बोस
    • अंक              : 10
    • कुल पृष्ठ        : 36
    • भाषा            : हिंदी
    • प्रकाशक      : गौरव गाथा पब्लिकेशन, नई दिल्ली 
    • प्रकाशन वर्ष : अक्टूबर 1981
    पढ़ें : 63 mb

    August 25, 2022

    Gaurav Gatha(Hindi)-11-Dalai Lama

     गौरव गाथा (हिंदी)-11-दलाई लामा












    परम पावन चौदहवें दलाई लामा तेनज़िन ग्यात्सो 29 मई 2011 तक तिब्बत के राजकीय प्रमुख रहे और उपरोक्त तिथि पर उन्होंने अपनी सारी राजनीतिक शक्तियाँ तथा उत्तरदायित्व प्रजातांत्रिक तरीके से चुने हुए तिब्बती नेतृत्व को हस्तांतरित किये। अब वे केवल तिब्बत के सर्वोच्च आध्यात्मिक गुरु हैं। उनका जन्म 6 जुलाई 1935 को उत्तरी तिब्बत में आमदो के एक छोटे गाँव तकछेर में एक कृषक परिवार में हुआ था। दो वर्ष की आयु में ल्हामो दोंडुब नाम का वह बालक तेरहवें दलाई लामा थुबतेन ग्यात्सो के अवतार के रूप में पहचाना गया। ऐसा विश्वास है कि दलाई लामा अवलोकितेश्वर या चेनेरेज़िग का रूप हैं जो कि करुणा के बोधिसत्त्व तथा तिब्बत के संरक्षक संत हैं।  बोधिसत्त्व प्रबुद्ध सत्त्व हैं जिन्होंने अपना निर्वाण स्थगित कर मानवता की सेवा के लिए पुनः जन्म लेने का निश्चय लिया है। 1989  में तिब्बत को स्वतंत्र कराने में उनके अहिंसात्मक संघर्ष के लिए उन्हें नोबेल शांति पुरस्कार से सम्मानित किया गया। अत्यधिक आक्रात्मक स्थितियो में भी वे निरंतर अहिंसात्मक नीतियों का समर्थन करते रहे हैं। वे पहले नोबेल विजेता हुए हैं जिन्होंने वैश्विक पर्यावरण की समस्याओं के प्रति अपनी चिंता जताई।
    दलाई लामा 6 महाद्वीपों के 62 से भी अधिक देशों की यात्रा कर चुके हैं। वे बड़े देशों के राष्ट्रपतियों, प्रधानमंत्रियों और राजकीय शासकों से मिले हैं। वे विभिन्न धर्मों के प्रमुखों और जाने माने वैज्ञानिकों से भी संवाद कर चुके हैं। उनके शांति, अहिंसा, अंतर्धर्मीय समझ, सार्वभौमिक उत्तरदायित्व तथा करुणा के संदेश को देखते हुए 1959 से दलाई लामा को 84 से भी अधिक सम्मान, सम्माननीय डॉक्टरेट, पुरस्कार इत्यादि मिल चुके हैं। दलाई लामा ने 72 से भी अधिक पुस्तकें लिखी है। दलाई लामा स्वयं को एक साधारण बौद्ध भिक्षु कहकर संबोधित करते हैं।


    • गौरव गाथा
    • शीर्षक          : दलाई लामा
    • अंक              : 11
    • कुल पृष्ठ        : 36
    • भाषा            : हिंदी
    • प्रकाशक      : गौरव गाथा पब्लिकेशन, नई दिल्ली 
    • प्रकाशन वर्ष : जनवरी 1982
    पढ़ें : 57 mb

    August 25, 2022

    Gaurav Gatha(Hindi)-12-Jallianwala Bagh

     गौरव गाथा (हिंदी)-12-जलियावाला बाग़

    और शहीद ऊधम सिंह



















    पंजाब के अमृतसर शहर का एक साधारण सा बाग एक बर्बर खूनी दास्तां का गवाह है, भारत के इतिहास में जालियांवाला बाग एक ऐसी घटना का शिकार बना जिसे इतिहास में काला दिन दर्ज किया गया। इस घटना को याद करके लोग आज भी सहम उठते हैं।

    13 अप्रैल, 1919 का दिन किसी भारतीय के लिए न भूलने वाला दिन है. इस दिन जनरल डायर के नेतृत्व में ब्रिटिश सेना की टुकड़ी ने निहत्थे भारतीय प्रदर्शनकारियों पर अंधाधुंध गोलियां चलाकर बड़ी संख्या में नरसंहार किया था. इस बाग में एकजुट होकर भारतीय प्रदर्शनकारी रोलट एक्ट का विरोध कर रहे थे। रविवार का दिन था, उस दिन सारे देश में बैशाखी की खुशियां मनाईं जा रहीं थीं। बाग में आसपास के कई किसान और सिखधर्मी इक्कठा हुए थे। यह एक साधारण सा बाग हुआ करता था जो चारों ओर से घिरा हुआ था। अंदर आने के लिए केवल एक सकरा सा रास्ता ही था। कहा जाता है कि, करीब शाम 4 बजे का वक्त था, जनरल डायर को जैसे ही इसकी जानकारी मिली वह सेना के साथ पहुंचा, उसने अपने सिपाहियों को बाग के एकमात्र तंग प्रवेश मार्ग पर तैनात कर दिया। डायर ने बिना किसी चेतावनी के सैनिकों को गोलियां चलाने का आदेश दे दिया। फिर क्या था चारों ओर चीखें सुनाई देने लगी। डरे-सहमे हुए निहत्थे बच्चे, महिलाएं, बुजुर्ग हजारों गोलियों के शिकार बनना शुरु हो गये। कुछ लोग तो गोलियों से मारे गए तो कुछ भगदड़ में मारे गए। कुछ लोग जान बजाने के लिए पार्क में बने कुंए में कूद गए। इस घटना में हजारों निर्दोष मारे थे। 


    • गौरव गाथा
    • शीर्षक         : जलियावाला बाग़
    • अंक             : 12
    • कुल पृष्ठ       : 36
    • भाषा            : हिंदी
    • प्रकाशक      : गौरव गाथा पब्लिकेशन, नई दिल्ली 
    • प्रकाशन वर्ष : मार्च 1982
    पढ़ें : 50 mb

    August 25, 2022

    Gaurav Gatha(Hindi)-13-Ganga

     गौरव गाथा (हिंदी)-13-गंगा














    भारत की सबसे महत्त्वपूर्ण नदी गंगा जो भारत और बांग्लादेश में मिलाकर २,५१० किमी की दूरी तय करती हुई उत्तरांचल में हिमालय से लेकर बंगाल की खाड़ी के सुंदरवन तक विशाल भू भाग को सींचती है, देश की प्राकृतिक संपदा ही नहीं, जन जन की भावनात्मक आस्था का आधार भी है । सामाजिक, साहित्यिक, सांस्कृतिक और आर्थिक दृष्टि से अत्यंत महत्त्वपूर्ण गंगा का यह मैदान अपनी घनी जनसंख्या के कारण भी जाना जाता है । यह नदी भारत में पवित्र मानी जाती है तथा इसकी उपासना माँ और देवी के रूप में की जाती है। भारतीय पुराण और साहित्य में अपने सौंदर्य और महत्व के कारण बार-बार आदर के साथ वंदित गंगा नदी के प्रति विदेशी साहित्य में भी प्रशंसा और भावुकतापूर्ण वर्णन किए गए हैं |
    गंगा नदी के साथ अनेक पौराणिक कथाएँ जुड़ी हुई हैं। मिथकों के अनुसार ब्रह्मा ने विष्णु के पैर के पसीने की बूँदों से गंगा का निर्माण किया। त्रिमूर्ति के दो सदस्यों के स्पर्श के कारण यह पवित्र समझा गया। एक अन्य कथा के अनुसार राजा सगर ने जादुई रुप से साठ हजार पुत्रों की प्राप्ति की । एक दिन राजा सगर ने देवलोक पर विजय प्राप्त करने के लिये एक यज्ञ किया। यज्ञ के लिये घोड़ा आवश्यक था जो ईर्ष्यालु इंद्र ने चुरा लिया था। सगर ने अपने सारे पुत्रों को घोड़े की खोज में भेज दिया अंत में उन्हें घोड़ा पाताल लोक में मिला जो एक ऋषि के समीप बँधा था। सगर के पुत्रों ने यह सोच कर कि ऋषि ही घोड़े के गायब होने की वजह हैं उन्होंने ऋषि का अपमान किया। तपस्या में लीन ऋषि ने हजारों वर्ष बाद अपनी आँखें खोली और उनके क्रोध से सगर के सभी साठ हजार पुत्र जल कर वहीं भस्म हो गये । सगर के पुत्रों की  अंतिम संस्कार नहीं किया गया था । सगर के वंशज  भगीरथ ने अपने पूर्वजों का अंतिम संस्कार किया, उन्होंने गंगा को पृथ्वी पर लाने का प्रण किया| भगीरथ ने ब्रह्मा की घोर तपस्या की तथापि ब्रह्मा प्रसन्न हुये और गंगा को पृथ्वी पर भेजने के लिये तैयार हुये ताकि सगर के पुत्रों की आत्माओं की मुक्ति संभव हो सके। तब भगीरथ ने भगवान शिव से निवेदन किया और उन्होंने अपनी खुली जटाओं में गंगा के वेग को रोक कर, एक लट खोल दी, जिससे गंगा की अविरल धारा पृथ्वी पर प्रवाहित हुई। वह धारा भगीरथ के पीछे-पीछे गंगा सागर संगम तक गई, जहाँ सगर-पुत्रों का उद्धार हुआ। शिव के स्पर्श से गंगा और भी पावन हो गयी और पृथ्वी वासियों के लिये बहुत ही श्रद्धा का केन्द्र बन गयीं। पुराणों के अनुसार स्वर्ग में गंगा को मन्दाकिनी और पाताल में भागीरथी कहते हैं। 


    • गौरव गाथा
    • शीर्षक         : गंगा
    • अंक             : 13
    • कुल पृष्ठ       : 36
    • भाषा            : हिंदी
    • प्रकाशक      : गौरव गाथा पब्लिकेशन, नई दिल्ली 
    • प्रकाशन वर्ष : मई 1982
    पढ़ें : 64 mb 

    August 25, 2022

    Gaurav Gatha(Hindi)-14-Sri Arvind

     गौरव गाथा (हिंदी)-14-श्री अरविन्द














    अरविन्द घोष या श्री अरविन्दएक महान योगी एवं दार्शनिक थे। वे १५ अगस्त १८७२ को कलकत्ता में जन्मे थे। इनके पिता एक डाक्टर थे। इन्होंने युवा अवस्था में स्वतन्त्रता संग्राम में क्रान्तिकारी के रूप में भाग लिया, किन्तु बाद में यह एक योगी बन गये और इन्होंने पांडिचेरी में एक आश्रम स्थापित किया। वेद, उपनिषद ग्रन्थों आदि पर टीका लिखी। योग साधना पर मौलिक ग्रन्थ लिखे। उनका पूरे विश्व में दर्शन शास्त्र पर बहुत प्रभाव रहा है और उनकी साधना पद्धति के अनुयायी सब देशों में पाये जाते हैं। यह कवि भी थे और गुरु भी।
    देशभक्ति से प्रेरित इस युवा ने जानबूझ कर घुड़सवारी की परीक्षा देने से इनकार कर दिया और राष्ट्र-सेवा करने की ठान ली। इनकी प्रतिभा से बड़ौदा नरेश अत्यधिक प्रभावित थे अत: उन्होंने इन्हें अपनी रियासत में शिक्षा शास्त्री के रूप में नियुक्त कर लिया। बडौदा में ये प्राध्यापक, वाइस प्रिंसिपल, निजी सचिव आदि कार्य योग्यता पूर्वक करते रहे और इस दौरान हजारों छात्रों को चरित्रवान देशभक्त बनाया।
    लार्ड कर्जन के बंग-भंग की योजना रखने पर सारा देश तिलमिला उठा। बंगाल में इसके विरोध के लिये जब उग्र आन्दोलन हुआ तो अरविन्द घोष ने इसमे सक्रिय रूप से भाग लिया। नेशनल ला कॉलेज की स्थापना में भी इनका महत्वपूर्ण योगदान रहा। मात्र ७५ रुपये मासिक पर इन्होंने वहाँ अध्यापन-कार्य किया। पैसे की जरूरत होने के बावजूद उन्होंने कठिनाई का मार्ग चुना। अरविन्द कलकत्ता आये तो राजा सुबोध मलिक की अट्टालिका में ठहराये गये। पर जन-साधारण को मिलने में संकोच होता था। अत: वे सभी को विस्मित करते हुए 19/8 छक्कू खानसामा गली में आ गये। उन्होंने किशोरगंज (वर्तमान में बंगलादेश में) में स्वदेशी आन्दोलन प्रारम्भ कर दिया। अब वे केवल धोती, कुर्ता और चादर ही पहनते थे। उसके बाद उन्होंने राष्ट्रीय विद्यालय से भी अलग होकर अग्निवर्षी पत्रिका वन्देमातरम् का प्रकाशन प्रारम्भ किया।

    ब्रिटिश सरकार इनके क्रन्तिकारी विचारों और कार्यों से अत्यधिक आतंकित थी अत: २ मई १९०८ को चालीस युवकों के साथ उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। इतिहास में इसे 'अलीपुर षडयन्त्र केस' के नाम से जानते है। उन्हें एक वर्ष तक अलीपुर जेल में कैद रखा गया।| अलीपुर जेल में ही उन्हें हिन्दू धर्म एवं हिन्दू-राष्ट्र विषयक अद्भुत आध्यात्मिक अनुभूति हुई। इस षड़यन्त्र में अरविन्द को शामिल करने के लिये सरकार की ओर से जो गवाह तैयार किया था उसकी एक दिन जेल में ही हत्या कर दी गयी। घोष के पक्ष में प्रसिद्ध बैरिस्टर चितरंजन दास ने मुकदमे की पैरवी की थी। उन्होने अपने प्रबल तर्कों के आधार पर अरविन्द को सारे अभियोगों से मुक्त घोषित करा दिया। इससे सम्बन्धित अदालती फैसले ६ मई १९०९ को जनता के सामने आये। ३० मई १९०९ को उत्तरपाड़ा में एक संवर्धन सभा की गयी वहाँ अरविन्द का एक प्रभावशाली व्याख्यान हुआ जो इतिहास में उत्तरपाड़ा अभिभाषण के नाम से प्रसिद्ध हुआ। उन्होंने अपने इस अभिभाषण में धर्म एवं राष्ट्र विषयक कारावास-अनुभूति का विशद विवेचन करते हुए कहा था |

    "जब मुझे आप लोगों के द्वारा आपकी सभा में कुछ कहने के लिए कहा गया तो में आज एक विषय हिन्दू धर्मं पर कहूँगा। मुझे नहीं पता कि मैं अपना आशय पूर्ण कर पाउँगा या नहीं। जब में यहाँ बैठा था तो मेरे मन में आया कि मुझे आपसे बात करनी चाहिए। एक शब्द पूरे भारत से कहना चाहिये। यही शब्द मुझसे सबसे पहले जेल में कहा गया और अब यह आपको कहने के लिये मैं जेल से बाहर आया हूँ।"

    "एक साल हो गया है मुझे यहाँ आए हुए। पिछली बार आया था तो यहाँ राष्ट्रीयता के बड़े-बड़े प्रवर्तक मेरे साथ बैठे थे। यह तो वह सब था जो एकान्त से बाहर आया जिसे ईश्वर ने भेजा था ताकि जेल के एकान्त में वह इश्वर के शब्दों को सुन सके। यह तो वह ईश्वर ही था जिसके कारण आप यहाँ हजारों की संख्या में आये। अब वह बहुत दूर है हजारों मील दूर |"

    • गौरव गाथा
    • शीर्षक          : श्री अरविन्द
    • अंक              : 14
    • कुल पृष्ठ        : 36
    • भाषा             : हिंदी
    • प्रकाशक       : गौरव गाथा पब्लिकेशन, नई दिल्ली 
    • प्रकाशन वर्ष  : जुलाई 1982
    पढ़ें : 62 mb